हम पुरुष से पुरुषोत्तम बन सकते हैं












प्रस्तुति:-डाटला एक्सप्रेस, लेखक:-राकेश राय (गाज़ियाबाद) 

यदि आत्मा और परमात्मा का संयोग संभव हो सके, तो साधारण सा दीन - हीन दीख पड़ने वाला व्यक्ति नर से नारायण बन सकता है और उसकी महानता परमात्मा जितनी ही विशाल हो सकती है। 

आत्मा और परमात्मा में अंतर उत्पन्न करने वाली माया और कुछ नहीं केवल अज्ञान का एक कलेवर मात्र है । भौतिक आकर्षणों ,अस्थिर सम्पदाओं और उपहासास्पद तृष्णाओं , वासनाओं में उलझे रहने से मनुष्य के लिए यह सोच-समझ सकना कठिन हो जाता है कि वह जिस अलभ्य अवसर को, मनुष्य शरीर को प्राप्त कर सकता है , वह एक विशेष सौभाग्य है और उसका सदुपयोग जीवन - लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए , विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही होना चाहिए । शर का ही नहीं , आत्मा का भी आनंद ध्यान में रखना चाहिए। 

यदि हम अपने स्वरूप और कर्तव्य को समझ सकें और तदनुकूल कार्य करने के लिए तत्पर हो सकें, तो इस क्षुद्रता और अशांति से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है , जिसके कारण हमें निरंतर क्षुब्ध रहना पड़ता है । अज्ञान की माया से छुटकारा पाना ही मनुष्य का परम पुरुषार्थ है । ऐसे पुरुषार्थी को ईश्वरीय महानता उपलब्ध हो सकती है और वह पुरुष" से पुरुषोत्तम बन सकता है।

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