मशहूर रचनाकार श्री सुनील पांडेय "जौनपुर" द्वारा रचित रचना "पागल"

प्रस्तुति "डाटला एक्सप्रेस" 

तैर रहे हैं तेरी आंख में काजल , पागल !

आंसू उमड़ रहे क्यों जैसे बादल ? पागल !

धरा तीक्ष्ण, उद्विग्न गगन, भैरवी पवन ;

आहत है सुकुमार-गात मूर्छित प्रसून-मन ।

खोल हृदय पट,बंद न कर,दुख-सांकल , पागल !

आंसू उमड़ रहे क्यों जैसे बादल ? पागल !

ज्योतिर्मय हो, दीपशिखा, तुम शांत चेतना ;

व्यापक हो ब्रह्मांड सदृश क्या तुम्हें मूर्छना ?

किस तम का तुम ओढ़े बैठी आंचल , पागल !

आंसू उमड़ रहे क्यों जैसे बादल ? पागल !

यज्ञ पश्च की धूम्र अग्नि हो मधुर आचमन ,

सुरभित तुझसे सारा जग, आलोकित कन-कन ।

छनक रही है चतुर्दिशा त्वम छागल , पागल !

आंसू उमड़ रहे क्यों जैसे बादल ? पागल !

आत्ममुग्ध हो, कर्ता का अधिकार बोध है ;

जीव और परमात्म मध्य का बस विरोध है ।

स्व-विस्मृत हो ऐसे जैसे पागल , पागल !

आंसू उमड़ रहे क्यों जैसे बादल ? पागल !!



सुनील पांडेय / जौनपुर

8115405665

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