अलवर की मशहूर साहित्यकार ममता शर्मा 'अंचल' द्वारा रचित एक अद्भुत रचना 'प्रेम पत्र'

प्रस्तुति 'डाटला एक्सप्रेस' 


प्रेम पत्र??? ना!!ना!! प्रेम परिचर्चा । हाँ जी ! अब ठीक समझे आप । प्रत्यक्ष मिलकर चर्चा करना कहीं बेहतर होता पर... एक वर्ष तो कोरोना ही लील गया। पाँवों में बेड़ियाँ और मुख पर पट्टी। गति बन्द, मति मंद और जुबान भी बंद... पर इस घुटन का क्या करूँ जो घटे तो कुछ सूझे। ऐसे में इस जलन का क्या करूँ जो उन यादों ने कम ही नहीं होने दी जो जौंक सी चिपकी है मेरे तन पर भी और मन पर भी। ऐसे में पत्र लिखकर कुछ राहत पाने के अलावा और कुछ सूझा ही नहीं। सोचोगे तो अवश्य कि पत्र और वह भी बरसों बाद । पर क्या करूं? कुछ तो मन की सनक और कुछ झिझक भी। पर आज हिम्मत जुटा ही ली। 

सुनो ! पत्र भी एक दस्तावेज़ ही तो होता है संवेदनाओं का, सम्भावनाओं का और सुखद कल्पनाओं का। कई बार तो पत्र माध्यम बन जाता है और कारण भी कहानियों का, कविताओं का। आप ध्यान से पढ़ना इसे और फिर जो महसूस करो उसे भेजना मेरे पास हवाओं के पंखों पर लिखकर। हवाएँ जब छुएँगी ना मुझे , सब जान जाऊँगी। समझ लूँगी क्योंकि यह कला है मेरे पास। आखिर आपकी बावरी कनुप्रिया हूँ ना मैं। हूँ कि नहीं ?

सर्दियों में कई बार इच्छा होती है कि छत पर जाऊँ और मुँडेर पर बैठी धूप से बतियाऊं । जब भी जाती हूँ तो हर बार वही धूप कुछ अलग दिखती है और अलग सा सुखद अहसास कराती है । सच कहूँ तो पत्र लिखना भी कुछ वैसा ही सुकून देता है मेरे कनु !

और सुनो ! एक राज की बात बताती हूँ । यह जो प्रेम है ना, यह एक ताबीज़ ही तो है । हम अपने प्रेम को ताबीज़ की तरह बाँधलें गले में या बाँह में ताकि ये दिखे भी नहीं और अपना काम चुपचाप करता भी रहे।गले की नसों से ही तो है प्रेम के मंतर का राब्ता। वही सेकती रहती है सांस। यह मंतर हमारी साँसों के दर्द को सेकता सहलाता रहता है ।यह एक सुमिरनी है जो प्रेमी का सुमिरन करते हुए प्रेमी को परमात्मा तक पहुँचा देती है। प्रेमशास्त्र में प्रेमी को इसीलिए ईश्वर का रूप माना गया है। क्या आपको भी ऐसा ही लगता है, लिखना आप भी ख़त में।

मुझे अक्सर लगता है कि प्रेम खिड़की के रास्ते भीतर आने वाली धूप नहीं बल्कि धूल है। धूप का टिकाव होता ही कितना सा है भला! और प्रेम में तो यादें धूल की तरह चिपक जाती है मन पर और तन पर और अन्तर्मन तक ।

तन पर मादक छुअनों की धूल और मन पर उनके अहसासों की धूल । मुझे तो ऐसा ही लगता है । तुम कैसा अनुभव करते हो कल्पनालोक के वीर ?

तुम्हारी हीर तो ढकी पड़ी है इसी धूल से और हाँ, हम उस धूल को चाहे जितना भी झाड़ें - पोंछे वह और ज्यादा चिपक जाती है मन की दीवारों पर। उसे धोता है प्रेम का बादल अपनी फुहारों से।

फिर बावरी कहकर डांटेंगे मुझे । मैं तो हूँ ही बावरी । कुछ भाग्य की चाल के कारण और कुछ आपके निश्छल प्यार के कारण। यह जो प्रेम का बादल है ना, यह तन के साथ अन्तर्मन तक को सिक्त कर देता है ।प्रेम दिखाने की वस्तु नहीं है मेरे कान्हा !यह तो साँसों की भी साँस है। हमारे भीतर के जप में रमाये रहने वाली रटन है यह। हम प्रेम के अहसास में बेसुध होकर दुनिया में जाग्रत अवस्था में दिनचर्या के सभी कार्य करते रहते हैं और वह भी पूरे होश और जोश के साथ। प्रेम के बिना तो जीवन ही निर्जीव है मेरे माधव!

जीवन में भी जी डालने का हुनर प्रेम के पास ही है। 

मैं नहीं जानती मेरे कनु ! कि तुम मुझे किस रूप में देखते हो परन्तु तुम मेरे लिए पूजा के आले में महकती अगरबत्ती हो जो हरदम मेरे तन-मन को सुगन्ध से भरती रहती है। मेरी तो आत्मा तक तृप्त रहती है उस सुगन्ध से। आज कुछ खुलकर कह रही हूँ । मैं तो प्रेम के अभाव में अपनी खाली झोली लिए रेत के घोरों में भटकती एक जोगन ही रही हूँ आज तक । प्रेम मिले तो जीवन मिले । जीवन से कहाँ भिन्न है प्रेम ? कहो तो रे निष्ठुर ! मेरे जलधर ! इस चातकी को प्यासा मत लौटा देना। जिस तरह मछलियां पानी से प्रेम करती हैं खिलखिलाती हुई लहरों से किल्लोल करती हैं । पानी बिन मछली का कोई अस्तित्व नहीं उसी तरह तुम्हारे प्रेम बिन मेरा भी कोई अस्तित्व नहीं बस इतना ही जान लो।


ममता शर्मा "अंचल"

अलवर (राजस्थान)

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