पुस्तक समीक्षा ‘मनवा रे' प्रेम आसव में डुबाती अनूठी पुस्तक

 


डाटला एक्सप्रेस संवाददाता 

यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि आज के समय में ‘साहित्य’ शब्द कथा-कहानी, कविता, उपन्यास के लिए ही रूढ़ होता जा रहा है। ‘साहित्य’ शब्द सुनते ही यही हमारे मस्तिष्क में घूमने लगते हैं जबकि साहित्य की अनेक ऐसी सशसक्त विधाएँ हैं जो इनसे इतर हैं। आज जबकि साहित्य के नाम पर कविता, कहानी और उपन्यास ही सर्वाधिक लिखे जा रहे हैं, कुछ रचनाकार अपनी मौन साधना में लीन रहकर उक्त विधाओं से इतर सृजनरत हैं और साहित्य को अपने वैचारिक निबंधों-आलेखों से समृद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसी ही एक लेखिका हैं ज्योत्स्ना प्रवाह। ज्योत्स्ना जी के आलेख पिछले कई वर्षों से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। यूँ तो ज्योत्स्ना जी साहित्य की कई विधाओं में अपनी लेखनी चलाती हैं लेकिन उनकी सद्य प्रकाशित प्रथम पुस्तक ‘मनवा रे...’ ने उन्हें एक समृद्ध और विचारशील निबंधकारों की पंक्ति में खड़ा कर दिया है।

पुस्तक में प्रेम विषय पर आधारित बाइस अलग-अलग आलेख हैं। इस विषय को चुनने के पीछे ज्योत्स्ना ने लिखा है, “वह प्रेम ही है जो भीषण विपत्तियों और दुखों को झेलते हुए भी इंसान के भीतरआशा का समंदर सूखने नहीं देता...।” निश्चित रूप से प्रेम शाश्वत है। यह पूरी सृष्टि ही प्रेममय है। आदि काल से अबतक प्रेम को अलग-अलग रूपों में दर्शाया गया है। किसी ने प्रेम को ईश्वर माना है तो किसी ने आराधना माना है। कोई प्रेम को यज्ञ की ज्वाला समझता है तो कोई गंगा-सा पावन मानता है। पुस्तक के सम्बन्ध में वरिष्ठ लेखिका सूर्यबाला जी लिखती हैं, “पुस्तक से गुजरते हुए मैंने जाना कि प्रेम एक शब्द, एक अनुभूति, एक एहसास भर ही नहीं है अपितु अपनी गहराई और व्यापकता में अथाह, अछोर भी है।”

ज्योत्स्ना ने पुस्तक में आलेखों का संयोजन बहुत ही मनोवैज्ञानिक ढंग से किया है। इसका प्रमाण उनेक आलेखों के क्रम से मिलता है। प्रत्येक हृदय प्रेमगीत को गाना चाहता है या यूँ कहा जाए कि प्रत्येक संवेदनशील हृदय में प्रेम का बीज अंकुरित होता है जो विभिन्न भावों-मनोभावों और राग-विराग के खाद-पानी व धूप-छाया में पल्लवित और पुष्पित होता है। ज्योत्स्ना ने ऐसा ही विचार कर पुस्तक का आरंभ ‘प्रेम—एक गीत है’ शीर्षक आलेख से किया तथा अलग-अलग मार्गों से गुजारकर मित्रता में प्रेम की सार्थकता को सिद्ध किया। ज्योत्स्ना ने सफल-असफल प्रेम, रिश्तों में प्रेम, विश्व में प्रेम, भक्ति में प्रेम, प्रकृति में प्रेम, गुरु से प्रेम आदि-आदि विषयों पर आलेखों का सृजन किया है। इसके साथ ही उन्होंने पुस्तक में प्रेम और मोह के अन्तर को भी बताया है। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो प्रेम का अर्थ कामवासना से लगाते हैं, ज्योत्स्ना ने ऐसे लोगों की बुद्धि की शुद्धि के लिए बड़ी शालीनता से कहा है, “तुम किसी व्यक्ति को प्रेम कर सकते हो, क्योंकि वह तुम्हारी कामवासना की तृप्ति करता है। यह तो मात्र एक सौदा है, प्रेम नहीं।” सच्चे प्रेम की पहचान बताते हुए ज्योत्स्ना लिखती है, “जितना प्रेम विकसित होगा काम की शक्ति, प्रेम में अपने-आप समाहित हो जाएगी। जिस दिन प्रेम हृदय में भर जाएगा उस दिन उस हृदय की कामुकता अपने आप विलीन हो जाएगी...।” प्रेम तो ऐसा अथाह सागर है जिसमें मिलने के बाद व्यक्ति उसी में समा जाता है। जैसे सागर में समाने के बाद नदी को अलग नहीं क्या जा सकता ठीक उसी प्रकार प्रेम में समाए व्यक्ति को उससे अलग नहीं किया जा सकता।

आज की परिस्थितियाँ किसी से छुपी नहीं हैं। ऐसे में प्रेम जैसे विषय पर लिखना और उसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाना बहुत हिम्मत का काम है। इस संबंध में पुस्तक की भूमिका में प्रख्यात लेखिका, संपादिका और समीक्षक सुश्री कुसुमलता सिंह जी बिल्कुल सटीक बात कहती हैं, “सच तो यह है कि प्रेम जैसे बेहद संवेदनशील विषय पर कुछ लिखना बहुत बड़ी चुनौती है। सबके जीवन में प्रेम अवश्य होता है या आता है पर ऐसी कोई प्रयोगशाला नहीं बनी जहाँ इसे सिद्ध किया जा सके।” किन्तु मेरा मानना है कि पुस्तक को मनोयोग से पढ़ने वाले प्रत्येक पाठक को ज्योत्स्ना जी का जीवन प्रेम की प्रयोगशाला ही प्रतीत होगा क्योंकि प्रेम से जुड़े उनके अनुभव, अध्ययन, मनन, चिन्तन के साथ-साथ टूटन और बिखरन का ही विस्तार है जो अलग-अलग रूपों में इस पुस्तक में आया है। पुस्तक के आरंभ में ‘मेरा कहना है...’ में उन्होंने स्वयं स्वीकारा है, “मनवा रे...! मेरे टूटने, बिखरने और फिर एक नई राह पर चलने का परिणाम है।”

‘मनवा रे...’ प्रेम पर आधारित अपनी तरह की एक अनूठी पुस्तक है जिसे जितनी बार पढ़ा जाए उतनी बार प्रेम की नई-नई परिभाषाएँ सामने आती हैं और पाठक को प्रेम आसव में डुबा देती हैं। पुस्तक के आलेख जितने पठनीय और विचारपरक हैं, उसका प्रकाशन भी उतना ही आकर्षक और सुन्दर है। इसके लिए प्रकाशक ‘लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस’ बधाई के पात्र हैं। ‘मनवा रे...’ पाठकों के मन में स्थान बनाए ऐसी मंगलकामनाओं के साथ ज्योत्स्ना जी को उनकी प्रथम किन्तु सशक्त पुस्तक प्रकाशन के लिए हार्दिक बधाई और शुभेच्छाएँ।



पुस्तक का नाम मनवा रे.

लेखिका ज्योत्स्ना प्रवाह

प्रकाशक लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, नई दिल्ली

पृष्ठ 136

समीक्षक—

डॉ. लवलेश दत्त

165-ब, बुखारपुरा, पुरानाशहर बरेली (उ.प्र.) पिनकोड-243005

मो0-9412345679 ईमेल lovelesh.dutt@gmail.com

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