(लघु कथा) दलित कन्या


लेखक: निहाल छीपा "नवल"
गाडरवारा (म.प्र.)
प्रस्तुति: डाटला एक्सप्रेस


रघु… आज नवरात्रि का नौवाँ दिन है और कन्या पूजन करना है । जा… आस पड़ोस की सारी कन्याओं को कन्या जीमने का न्यौता दे आ ... ।
रघु की माँ प्रभा ने रघु से कहा …….…
माँ……… मैं अभी आता हूँ... कन्या जीमने का न्यौता देकर ....कहते हुए रघु चल दिया……


कुछ समय बाद सभी कन्याएं आ पहुँची।
रघु की माँ ने सभी कन्याओं के चरण प्रक्षालन कर आसन पर बैठा दिया तथा कन्याओं का लाल चुनरी ओढ़ा कर तिलक लगाकर पूजन किया।
अब कन्याओं को जीमने के लिए रघु सभी कन्याओं को भोजन की थाली परोसने लगा।
थाली देते हुए कुछ आगे बढ़ा तभी रघु की माँ ने रघु को टोका।
रघु रुक ! उस लड़की को थाली मत दे .....
रघु अचम्भित होकर प्रभा की ओर देखने लगा।
तभी प्रभा बोली ..... क्यों मीनी तू घर से थाली ग्लास क्यों नहीं लाई.....?
तुझे पता नहीं है कि तुम दलित किसी के घर उसके बर्तनों में भोजन नहीं पाते,
माँ की बात सुनकर रघु बोला....
माँ.......तुम भी रूढ़िवादी बातों को मानती हो…… क्या दलित कन्याएं पूज्यनीय नहीं होती हैं। अभी आपने उसके चरण धोकर चरणोदक लिया और अब सिर्फ बर्तनों में भोजन करने से बर्तन अशुद्ध हो जाते हैं और चरणोदक को लेने पर मुख शुद्ध रहता है......
माँ क्या दलित की कन्याओं में देवी अंश नहीं होता, सिर्फ कन्या जीमाने का यह कैसा आडम्बर क्या. इस व्यवहार माँ दुर्गा प्रसन्न होंगी ........ नहीं........ कभी नहीं.


डाटला एक्सप्रेस
संपादक:राजेश्वर राय "दयानिधि"
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