ढूँढ़ लेते हैं

(41)


कोई ग़म हो,खुशी हो या कोई हो दौर दुनिया का-
मगर हम पीने वाले सौ  बहाने ढूँढ़ लेते हैं.


हमारे सायों से बेशक़ हर इक परहेज़ करता हो-
मगर हम महफिलों खातिर ठिकाने ढूँढ़ लेते हैं। 


ज़माने में जहां देखो वहीं ग़म के ही मंज़र हैं-
ग़मों में भी खुशी के हम तराने ढूँढ़ लेते हैं। 


बचाने को बखेड़े हम बहुत बच-बच के चलते हैं-
बचें कितना मगर, हमको फ़साने ढूँढ़ लेते हैं। 


बहुत पोशीदा ढंग से जब नई दुनिया बसाते हैं-
तो वो मनहूस से, गुज़रे ज़माने ढूँढ़ लेते है। 


जवानी लाख पर्दों में कहीं कोई छुपा डाले-
मगर कैसे भी करके हम सयाने ढूँढ़ लेते हैं। 


जिन्हें हम छोड़ आये थे नये रिश्तों की चाहत में-
वही खोये हुए हमको पुराने ढूँढ़ लेते हैं। 


बेचारा 'राज' जिन लम्हों से बचके दूर चलता है-
उसे यादों के वो रंगी ख़ज़ाने ढूँढ़ लेते हैं।
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राज राजेश्वर/दिल्ली/8800201131
rajeshwar.azm@gmail.com


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राज राजेश्वर/दिल्ली/8800201131
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प्रस्तुति: डाटला एक्सप्रेस


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