प्रस्तुत हैं डॉ. नागेन्द्र अनुज के चुनावी चौके

 


(1)
हम आप बह न जायें समय के बहाव में।
यारों संभल के रहना है अबकी चुनाव में।
इस बार दबाना है बटन सोच समझकर,
फिर भूल न हो जाय किसी के दबाव में।
(2)
ऊपर से दिलदार बहुत हैं,
भीतर से मक्कार बहुत हैं।
इनकी बातों में मत आना,
नेताजी होशियार बहुत हैं।।
(3)
इस लोकतंत्र का भी सम्मान ज़रूरी है।
अच्छे-बुरे की लेकिन पहचान ज़रूरी है।
इस देश के तुम्हीं हो मालिक भी विधाता भी,
इस हैसियत से सबका मतदान ज़रूरी है।
(4)
सड़क, पुल, नहर, बिजली, पानी की बातें।
महज़ चार दिन लंतरानी की बातें।
प्रजातंत्र है पूंजीपतियों की रखैल,
सभी दल में हैं राजा-रानी की बातें।
(5)
जब देखो जाति-धर्म पे पंगा करा दिया।
चौराहे पर ग़रीब को नंगा करा दिया।
इन रहबरों ने वोट की ख़ातिर हमारे बीच,
अक्सर चुनाव आते ही दंगा करा दिया।
(6)
मुहब्बत का लबादा ओढ़ नफ़रत पर उतर आये।
यहाँ नेता जी किस घटिया सियासत पर उतर आये।
हिदायत है सँभल जाओ, अभी भी वक़्त है वर्ना,
कहीं ऐसा न हो जनता बगावत पर उतर आये।
(7)
फुसला के राजनीति का बंदर न चला जाय।
पक्के घरों के नाम पे छप्पर न चला जाय।
जो आज रख रहे हैं मेरे सर पे पगड़ियाँ,
कल इसके साथ अपना कहीं सर न चला जाय।
(8)
न बहलाओ सड़क, नल, नालियों पर।
नज़र डालो हमारी थालियों पर।
सताओ मत हमें बेबस समझकर,
उतर आयें न हम सब गालियों पर।
(9)
सड़क छाप कुछ ऐसे-वैसे लोगों को।
टिकट बँट रहा कैसे-कैसे लोगों को।
हर पार्टी के हर नेता का मकसद है,
मूर्ख बनाना जैसे-तैसे लोगों को।
(10)
अपने वादों से फिर गये नेता।
चंद मुद्दों पे घिर गये नेता।
गालियों पर उतर गये छी-छी,
इतना कैसे ये गिर गये नेता।
(11)
रब से मतलब न राम से मतलब।
इनको बस अपने काम से मतलब।
मुल्क़ की आबरू बिके तो बिके,
ये तो रखते हैं दाम से मतलब।
(12)
चार दिन सुख के काट लें हम भी।
ख़ुद को सुविधा से पाट लें हम भी।
सुबूत देता हूँ मैं अपनी वफादारी का,
आप थूकें तो चाट लें हम भी।
(13)
बंदूक, राइफ़ल, तो कुछ लुकाड़ियाँ लिए।
पैसे कभी, दारू तो कभी, साड़ियाँ लिए।
फिर भेष बदलकर डरी जनता को लूटने,
डाकू निकल पड़े हैं मँहगी गाड़ियाँ लिए।
(14)
मेरे भाइयों फिर इलेक्शन निकट है।
उन्हीं पूंजीपतियों के हाथों टिकट है।
कोई नाग है तो कोई साँप विषधर,
किसे वोट दें ये समस्या विकट है।
(15)
आ गये हैं लोग इसमें फ़िल्मनगरी छोड़कर।
वो जया, हेमा हों या फिर उर्मिला मांतोड़कर।
है सियासत आजकल व्यवसाय जनसेवा नहीं,
इसमें जो आया कभी लौटा नहीं मुँह मोड़कर।
(16)
तुमको तो फ़िक्र है बस अपने तख़्तो-ताज की।
हमको तो खाये जा रही चिन्ता अनाज की।
इस बार नए जुमलों से बहलाइये जनाब,
सच जान चुके हम तुम्हारे रामराज की।
(17)
बस इतना मत समझो कि मतदाता हूँ।
सच तो है भारत का भाग्यविधाता हूँ।
तुम मेरे हिस्से की मौज उड़ाते हो,
मैं बदकिस्मत सूखी रोटी खाता हूँ।
(18)
उनकी तमाम कोशिशें बेकार न जायें।
कश्ती बग़ैर दरिया के उस पार न जायें।
लड़ने से बचा करते हैं अक्सर कोई चुनाव-
कुछ लोग जिन्हें डर है कहीं हार न जायें।
_________________________



डॉ. नागेन्द्र अनुज


डाटला एक्सप्रेस
संपादक:राजेश्वर राय "दयानिधि"
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