प्रस्तुत है कवि 'राज राजेश्वर' की उनके 'मुसाफ़िर'.....संग्रह से एक सुप्रसिद्ध रचना. "आख़िर मैं क्यों ज़िन्दा हूँ...?" -------------------------------------


बिखरे मेरे रदीफ़ - क़ाफ़िये नहीं रहा मानिंदा हूँ-
बिखरी-बिखरी ग़ज़लें लेकर ख़ुद पे ही शर्मिंदा हूँ।
आख़िर मैं क्यों ज़िन्दा हूँ....?


उपदेशक बनता हूँ यारों,मगर हक़ीक़त ये है कि -
हवस-हिर्स से भरा हुआ मैं फिरता एक पुलिंदा हूँ।
आख़िर मैं क्यों ज़िन्दा हूँ....?


दो हाथों-पैरों वाला कहने को तो मैं मानव हूँ-
लेकिन गुण देखूँ तो अंदर से मैं एक दरिंदा हूँ।
आख़िर मैं क्यों ज़िन्दा हूँ.....?


ग़ुरबत ने अपनी ग्रिप में ले लिया मुझे धीरे - धीरे-
उजड़ी हुई रियासत का अब लुटा हुआ बाशिंदा हूँ।
आख़िर मैं क्यों ज़िन्दा हूँ.....?


बातें आसमान छूने की बढ़-चढ़ कर मैं करता हूँ-
मगर असलियत ये है कि मैं पंखविहीन परिंदा हूँ।
आख़िर मैं क्यों ज़िन्दा हूँ.....?


कहाँ गोपियां,कहाँ रासलीला अब रही ज़िन्दगी में-
अब तो भैया ले दे कर बस नाम का ही गोविंदा हूँ।
आख़िर मैं क्यों ज़िन्दा हूँ.....?


तान-तान कर तार तोड़ डाला जीवन के साज़ों का-
अब शिक़स्त साज़ोवाला मैं बेसुर का साज़िंदा हूँ।
आख़िर मैं क्यों ज़िन्दा हूँ....?


कौन सुन रहा अब मेरे आदेशों को,उपदेशों को-
अब तो टहल बजाने वाला,मैं ख़ुद ही कारिंदा हूँ।
आख़िर मैं क्यों ज़िन्दा हूँ....?


पीकर उल्टी-टट्टी, चट्टी खाकर चिरकुट-चोरों की-
अभी तलक ना सुधरा,ऐसा ठर्रा-ठरकी रिंदा हूँ।
आख़िर मैं क्यूं ज़िन्दा हूँ....?


परस के कड़वी सच्चाई दुनिया से पंगा लेता हूँ-
सुने न जिसकी कोई,ऐसा शायर एक चुनिंदा हूँ।
आख़िर मैं क्यों ज़िन्दा हूँ....?


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